शरद पूर्णिमा: क्या आपको याद है, आज होगा टेसू और झेंझी का ब्याह
हमारे देश में रिति-रिवाजों के इतने रंग हैं कि सबको जानने के लिए एक जीवन भी कम पड़ जाए. हर कोने के अपने रिति-रिवाज़ हैं. कुछ पूरे देश में मशहूर हैं और कुछ एक दायरे में फल-फूल रहे हैं. एक समुदाय आज भी उसे जिवंत रखे हुए है इन्हीं में से एक है- ‘टेसू’.
हमारे देश में रीति-रिवाजों के इतने रंग हैं कि सब जानने के लिए एक जीवन भी कम पड़ जाए. हर कोने के अपने रीति-रिवाज़ हैं. कुछ पूरे देश में मशहूर हैं और कुछ एक दायरे में फल-फूल रहे हैं. एक समुदाय आज भी उसे जीवंत रखे हुए है. ऐसा ही एक त्यौहार है टेसू.
टेसू एक खास त्यौहार है जो बुन्देलखण्ड, ग्वालियर और उसके आस-पास के क्षेत्रों में धूमधाम से मनाया जाता है. इसकी तैयारियां नवमी से शुरू हो जाती हैं और शरद पूर्णिमा पर इसे धूमधाम से मनाया जाता है. दशहरे से पूर्णिमा तक लड़कों की टोलियां टेसू और लड़कियों की टोलियां सांझी लिये घर-घर घूमकर गीत गाते और पैसे मांगते है.
टेसू का कहानी
टेसू की उत्पत्ति और इस त्योहार के आरंभ के सम्बन्ध में यहां अनेक किवदंतियां प्रचलित है. बताया जाता है कि कुन्ती को अविवाहित अवस्था में ही उसे दो पुत्र उत्पन्न हुए थे, जिनमें पहला पुत्र बब्बरावाहन था, जिसे कुन्ती जंगल में छोड़ आई थी. वह बड़ा विलक्षण बालक था. पैदा होते ही सामान्य बालक से दुगनी रफ्तार से बढ़ने लगा और कुछ सालों बाद तो उपद्रव करना शुरू कर दिया. पांडव उससे बहुत परेशान रहने लगे तो सुभद्रा के कहने पर कृष्ण भगवान ने अपने सुदर्शन चक्र से उसकी गर्दन काट दी. परन्तु बब्बरावाहन अमर था. फिर कृष्ण ने अपनी माया से सांझी (झेंझी भी कहते हैं) को उत्पन्न किया और टेसू से उसका विवाह रचाया और उसे उपद्रव न करने का वादा लिया.
टेसू की मुख्य आकृति का ढांचा तीन लकड़ियों को जोड़ कर बनाया गया स्टेण्ड होता है जिस पर बीच में दीया, मोमबत्ती रखने का स्थान होता है. गांवो में जहां केवल टेसू का सिर बनाया जाता है उस पर गेरु पीली मिट्टी, चूना और काजल से रंगाई की जाती है. कहीं टेसू की मुखाकृति भयंकर राक्षस जैसी होती है तो कहीं साधारण मनुष्य जैसी.
पूर्णमासी से पहले 16 दिन तक बालिकाएं गोबर से चांद-तरैयां व सांझी माता बनाकर सांझी खेलती हैं. वहीं नवमी को सुअटा की प्रतिमा बनाकर टेसू-झेंझी के विवाह की तैयारियों में लग जाती हैं.
टेसू के नाक, कान और मुंह कौड़ी के बनाए जाते हैं. जिन्हें लड़कियां रोज सुबह पानी से उसे जगाने का प्रयास करती हैं. विवाह के बाद टेसू का सिर उखाड़ने के बाद लोग इन कौड़ियों को अपने पास रख लेते हैं. कहते हैं कि इन सिद्ध कौड़ियों से मन की मुरादें पूरी हो जाती हैं.
शहर के लोग तो इसे लगभग पूरी तरह भूल ही चुके हैं. लेकिन गांवों में कुछ हद तक यह परंपरा अभी भी जीवित है.
