शृष्टी रचना

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सृष्टि रचना पर कबीर धर्मदास संवाद ।
धर्मदास यह जग बौराना । कोई न जाने । पद निरवाना ।
यह कारन मैं । कथा पसारा । जग से कहियो । राम न्यारा ।
यही ज्ञान जग जीव सुनाओ । सब जीवों का भरम नशाओ ।
अब मैं तुमसे कहों चिताई । त्रय देवन की उत्पत्ति भाई ।
कुछ संक्षेप कहों गुहराई । सब संशय तुम्हरें मिट जाई ।
भरम गये जग वेद पुराना । आदि राम का भेद न जाना ।
राम राम सब जगत बखाने । आदि राम कोई बिरला जाने ।
ज्ञानी सुने सो ह्रदय लगाई । मूरख सुने सो गम्य ना पाई ।
माँ अष्टांगी पिता निरंजन । वे जम दारुण वंशन अंजन ।
पहले कीन्ह निरंजन राई । पीछे से माया उपजाई ।
माया रूप देख अति शोभा । देव निरंजन तन मन लोभा ।
कामदेव धर्मराय सताये । देवी को तुरत ही धर खाये ।
पेट से देवी करी पुकारा । साहब मेरा करो उबारा ।
टेर सुनी तब हम तहाँ आये ।  अष्टांगी को बन्द छुङाये ।
सतलोक में कीन्हा दुराचार । काल निरंजन दीन्हा निकार ।
माया समेत दिया भगाई । सोलह संख कोस दूरी पर आई ।
अष्टांगी और काल अब दोई । मन्द कर्म से गये  बिगोई ।
धर्मराइ को हिकमत कीन्हा । नख रेखा से भग कर लीन्हा ।
धर्मराय कीन्हा भोग  विलासा । माया को तब रही आसा ।
तीन पुत्र अष्टांगी जाये । बृह्मा विष्णु शिव नाम धराये ।
तीन देव विस्तार चलाये । इनमें यह जग धोखा खाये ।
पुरुष गम्य को कैसे पावे । काल निरंजन जग भरमावे ।
तीन लोक अपने सुत दीन्हा । सुन्न निरंजन वासा लीन्हा ।
अलख निरंजन सुन्न ठिकाना । बृह्मा विष्णु शिव भेद न जाना ।
तीन देव सो उनको ध्यावे । निरंजन का पार ना पावे ।
अलख निरंजन बङा बटपारा । तीन लोक जीव कीन्ह अहारा ।
बृह्मा विष्णु शिव नहीं बचाये । सकल खाय पुनि धूरि उङाये ।
तिनके सुत हैं तीनों देवा । आँधर जीव करत हैं सेवा ।
अकाल पुरुष काहू नहि चीन्हा । काल पुरुष सबही गहि लीन्हा ।
बृह्म काल सकल जग जाने । आदि बृह्म को ना पहचाने ।
तीनों देव और औतारा । ताको भजे सकल संसारा ।
तीनों गुण का यह विस्तारा । धर्मदास मैं कहों पुकारा ।
गुण तीनों की भक्ति में । भूल परो संसार । कहि कबीर निज नाम बिन कैसे उतरे पार ।

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